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Sunday, 18 December 2016

सूख गए फूटते ही अंकुर

सूख गए फूटते ही अंकुर

पहाड़ की सूनी सी गोद में
उजड़ी हुई उस बस्ती में
पसरा सन्नाटा, काई भरे परकोटे
यह खंडहर कुछ कहता है
यहाँ टूटे हर एक पत्थर के तले
दबी पड़ी है एक एक कहानी
यादों के आइने की गर्द के पीछे
काली-लाल फर्शियोँ के वे टुकड़े
ढूँढता हूँ इसी मलबे से जो
बने थे कुछ दीवार तो कुछ खंभे
कुछ मेहराब तो कुछ आसंदी
खेले थे हम ख्वाबों का आशियाना
खो गया वक्त की गहरी खाई में
छोड़ गया गुजरे साँप की सी लकीर

बस एक टुकड़ा खिड़की की
आधी अधूरी उन सीखचों का
आवाज देता है मलबे से, मैं यहाँ हूँ
कहानी का टुकड़ा बयान करता है
खिड़की इधर भी थी, उधर भी
पीछे से उभर आई मोहनी सी सूरत
ताकती वे एक जोड़ी शोख आँखे
झाँकती, अपनी ओर खींचतीं आँखें
गड़ गई थी सीने में गहरी तभी
कभी भी न निकलने के लिए
पाता हूँ जहाँ की तहाँ है आज भी

तुम्हें याद होगा अब भी वह
कंकर फेंक कर दुबक जाना
बात बात में मुँह चिढ़ाना
झरनों सी झर-झराती किलकारी
सुन रहे है कान मेरे वही अनुगूँज
लगता है बूढ़े बरगद के पीछे से
दौड़ कर अभी निकल आओगी
खोजता हूँ कहानी के बाक़ी टुकड़े
फेंके गए वे कंकर,
बरगद के पीछे तुम्हें,
यहीं कहीं होगी तुम
ढूँढता हूँ झाड़ियों झंकाड़ों में
काँटों में फँसे ओढ़नी के कुछ रेशे

टुकड़ा खिड़की की सीखचों का
झरोखा बनता है उसी कहानी का
ख्वाबों के रंगीन आशियाने का
हाँ, खिड़की का वह टुकड़ा पड़े पड़े
करता है बातें मुझसे, अब भी
उकेरता है एक अधूरी कहानी
जिन्दगी के एक बारीक सुराख से
झाँकती रहती है वही कहानी अक्सर
सपनों के सब्ज बीज से
जैसे सूख गए फूटते ही अंकुर,
उड़ गया हो कपूर थाली से
जैसे आरती के पहिले ही
आ गयी हो रात अंधियारी
जैसे शाम आने के पहिले ही
खिड़की का वह टुकड़ा पड़े पड़े
करता है बातें मुझसे, अब भी

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