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क्यों चले आते अचानक, फँस रहा होता भँवर में
क्यों बढ़ाते हाथ अपने, गिर रहा होता डगर में
कौन हो तुम जो लगे हो, साथ हर दम इस सफर में
कौन काँटे राह के यह बीनता फिरता शहर में।।
डूबता भव सिंधु में जब, कौन माझी आ खड़ा है
जन्म से प्यासे पथिक का, भर रहा खाली घड़ा है
भूलता जब राह अपनी, घेरती जब ज्वाल जग की
कौन भरता अंक में है, वह दयामय ही बड़ा है।।
जानता ही मैं नहीं वह, कौन है आता कहाँ से ?
सिंधु में आनन्द के नित, रसपान करवाता मुझे
थाम करके बाँह मेरी थपकियाँ जो दे रहा
कौन है जो इस हृदय में, साथ मेरे बस रहा।।
है करुण रस धार तेरी, नित निरंतर बह रही
प्रेम बन कर इस जगत में अनवरत ही चल रही
तुम अकारण ही कृपा, इस जीव पर जो कर रहे
यह रहे विश्वास अविचल, जब तलक जीवन रहे।।
कृतज्ञ
रामनारायण

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