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Friday, 23 December 2016

मुक्तक


सोई पड़ी है बिजलियाँ इन आँखों में, अभी मत जगाओ इन्हें।
मुस्कुराहटें सुस्ता रही इन आँखों मे, अभी मत जगाओ इन्हें।।
शोखियाँ दबी पड़ी है आँखों में, अभी मत जगाओ इन्हें।।
पलकें आधी गिरी आधी खुली है, न गिराओ न उठाओ इन्हें।

न खुद देख लेना उठ कर तुम, आइने से बचाओ इन्हें।
बिजलियाँ, शोखियाँ, शरारतें कहीं बिखर न जाए बचाओ इन्हें।।
हया के झीने परदे में ही रहें, बहुत शुमारी से बचाओ इन्हें।
जमाने को रखो ताक में हमारी नजरों से बचाओ इन्हें।।

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन