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Thursday, 13 October 2022

सागर किनारे


मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।

अँधेरे का दीपक मेरे साथ में है
रातों का काजल मेरे हाथ में है
मैं दिन के उजाले तुम्हें सौंपता हूँ।
कश्ती फँसी है जो तूफां में घिर के
नजर से तुम्हारी उसे यूँ बचा कर
मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।
    मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।

हुई शूल के संग आज मेरी मिताई
खिले फूल गुलशन से होती चुनाई
वही फूल अब मैं तुम्हें सौंपता हूँ।
झरे पात पतझर में तन से भले ही
बची थी फखत सूखी शाखे भले ही
मैं फिर भी नई कोंपलें सौंपता हूँ।।
    मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।

मेरे स्वप्नों के ये जखीरे पड़े हैं
कई प्रश्न पलकों पे मेरे खड़े हैं
फलक के सितारे तुम्हें सौंपता हूँ।
निरी प्यास ठहरी अधर पे है मेरी
रुँधा कण्ठ अवरुद्ध वाणी है मेरी
मैं गीतों की सरगम तुम्हें सौंपता हूँ।।
    मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।

हुई भोर तारे बिदा हो चले हैं
बुझते चिरागों के तन भी जले हैं
सुबह की किरन मैं तुम्हें सौंपता हूँ।
न फिर याद करना न फिर याद आना
ये आबाद बस्ती ये दिलकश जमाना
मैं तोहफे में जीवन तुम्हें सौंपता हूँ।।
    मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।

तुम्हारा सफर तेज रफ्तार का है
चल ना सका हम कदम बन के तेरे
मैं दिल की धड़कन तुम्हें सौंपता हूँ।
कैसे मैं भूलूँ पलों के वे मेले
बसे हैं जो अन्तस की गहराइयों में
उन्हें भर के गठरी तुम्हें सौंपता हूँ।।
    मैं सागर किनारे तुम्हें सौंपता हूँ।।

  रामनारायण सोनी
   १२.१०.२२

Friday, 28 January 2022

देखता हूँ कब जिधर भी

क्या कभी तुम उन पलों को
भूल से भी जी रहे हो।।

देखता हूँ जब जिधर भी
क्यूँ दिखाई दे रहे हो 
गीत की हर पंक्ति में
फिर फिर सुनाई दे रहे हो।
क्या अभी भी रंग के
छ्पके हिये में ही पड़े है
जो पिरोये प्यार के पल 
क्या अभी भी उर धरे हो।।
    देखता हूँ जब जिधर भी
    क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
    क्या कभी तुम उन पलों को
    भूल से भी जी रहे हो।।

मन कभी तन से निकल कर
दौड़ता उन वीथियों में
खिड़कियों की सीखचों से
झाँकता है झिल्लियों में।
क्या वही पगण्डियाँ सब
आज भी वैसी खड़ी हैं?
फुसफुसाती बतकही वे
क्या हृदय में ना गड़ी है?
    देखता हूँ जब जिधर भी
    क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
    क्या कभी तुम उन पलों को
    भूल से भी जी रहे हो।।

याद होगा गुम्बदों के 
बीच उगता चाँद वह भी
शीश का आभार काँधे 
हो रहा महसूस अब भी।
केश के विन्यास टूटे थे
महज इक अंगुली से
पंखुड़ी थी महमहाती
जो बिखरती अंजुली से।।
    देखता हूँ जब जिधर भी
    क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
    क्या कभी तुम उन पलों को
    भूल से भी जी रहे हो।।

जब लगी मेंहदी महावर
रंग राची थी हथेली
गीत, डफली, ढोलकों से
सज्ज थी तेरी हवेली।
पार इसके क्या सुना था?
गीत मन में गुनगुना था
उत्सवों की भीड़ में भी
एक बस मैं अनमना था।।
    देखता हूँ जब जिधर भी
    क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
    क्या कभी तुम उन पलों को
    भूल से भी जी रहे हो।।

क्या कभी नेपथ्य के फिर
अनकहे संवाद गूँजे?
क्या कभी उन मंदिरों के
देव जा कर फिर न पूजे?
याद हैं वह पुष्प मुझको 
देव प्रतिमा से गिरा था
बाँट कर दो भाग मे जो 
छिप छिपा हमने धरा था।।
    देखता हूँ जब जिधर भी
    क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
    क्या कभी तुम उन पलों को
    भूल से भी जी रहे हो।।

तुम न थी तो कौन था वो
सब तरफ मेरे खड़ा था
देह की गठरी खुली तो
कौन उस यम से लड़ा था।
क्या तुम्हारी बज़्म में
चर्चे मेरे भी हो सके हैं
दौड़ तुम तक अब न होगी
उम्र के ये पग थके हैं।।
    देखता हूँ जब जिधर भी
    क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
    क्या कभी तुम उन पलों को
    भूल से भी जी रहे हो।।

तुम न हो तो कौन है जो
सब तरफ मेरे खड़ा है
देह की गठरी खुली तो
कौन उस यम से लड़ा है।
क्या तुम्हारी बज़्म में
चर्चे मेरे भी हो सके हैं
दौड़ तुम तक अब न होगी
उम्र के ये पग थके हैं।।
    देखता हूँ जब जिधर भी
    क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
    क्या कभी तुम उन पलों को
    भूल से भी जी रहे हो।।

क्यूँ न जाने लग रहा है
जिन्दगी दो फाड़ सी है
एक मेरे साथ अब है
दूसरी मन में धँसी है।
तब पलों में चुक गई जो
अब दिवा के स्वप्न सी है
गाँठ में बस याद की वो
इक इमारत भग्न सी है।।
    देखता हूँ जब जिधर भी
    क्यूँ दिखाई दे रहे हो।
    क्या कभी तुम उन पलों को
    भूल से भी जी रहे हो।।

रामनारायण सोनी
28.01.22

Friday, 24 September 2021

मैं सम्पूर्ण हो गया हूँ

सुचिते!
तुम !
और तुम्हारा आस पास का 
वह सब
इनमे से
चाहा और चुना है मैंने 
सिर्फ तुम्हें ही
और देखो! सम्पूर्ण हो गया हूँ मैं

रामनारायण सोनी

मैने लिखना छोड़ दिया है

 

यह प्रदीप, ये नीहारिकाएँ

ये गुल्म और लताएँ

मन और सारी आशाएँ

ठहरे ठहरे और निष्प्राण हैं

अब लौट भी आओ शुभे!

मेरे उस महाप्रयाण से पहले

 

रामनारायण सोनी

 

२४.०९.२१

 

मैंने लिखना छोड़ दिया है

क्योंकि मैं...

किताबों में लिखे चेहरे

और चेहरे पर लिखी किताब

पढ़ना चाहता हूँ

इसलिये मैंने लिखना छोड़ दिया है

 

मैंने कहना छोड़ दिया है

क्योंकि मैं..

तुम्हारी पीड़ा, सुख-दुःख

तुम्हारी अनुभूतियाँ,

जिन्दगी के कड़वे, खट्टे-मीठे

सच सुनना चाहता हूँ

इसलिये मैंने कहना छोड़ दिया है

 

मैंने देखना छोड़ दिया है

अब मुझे महलों दुमहलों की

खिड़कियाँ, मेहराबें और कंगूरे

कुछ भी अच्छे नहीं लगते

क्योंकि मुझे..

पसीने से लथपथ इन मजूरों की

बरसाती से ढँकी वे झुग्गियाँ 

वे निचली बस्तियाँ, बस्तियों में

दौड़ता, हाँफता, बिलखता, आदमी

जहाँ टप्परो से टपकते हैं संत्रास,

उनमें सब और पैली

मच्छरों, मक्खियों के भिनभिनाहट

मुझे चैन से रहने नहीं देती

 

मैंने देखना - दिखाना छोड़ दिया है

जबकि वहाँ...

हमारे - तुम्हारे, इनके-उनके

फेंके गए कबाड़, उतरे- पुतरे

बीनते - बटोरते टालते - टटोलते

वे छोटे बड़े अधमरे जिस्म

मेरे जेहन में, चेतना के संसार में

तैरते रहते हैं

मैं देखता हूँ ठगा - ठिठका

मेरी इन छलछलाई ऑंखों से

नहीं देख पाता हूँ

वे गगनचुम्बी अट्टालिकाएँ

सभ्यता के शिखरों की चौंधियाती चमक

 

शायद इसलिये

छोड़ दिया है मैंने..

लिखना, कहना और दिखना

 

रामनारायण सोनी

लौट भी आओ!

यह प्रदीप, ये नीहारिकाएँ
ये गुल्म और लताएँ
मन और सारी आशाएँ
ठहरे ठहरे और निष्प्राण हैं
अब लौट भी आओ शुभे!
मेरे उस महाप्रयाण से पहले

रामनारायण सोनी
२४.०९.२१


तीन लघु कविताएँ

मैं 
और जीवन यह मेरा
दीवार पर टँगे दर्पण सा
कैसा यह बीत गया
रीता और क्रपण सा
लोग आये, लोग गये
अपने तन लेकर
और अपने मन लेकर
चुटकी भर धूल
लिपटी ही रही
जीवन के इस दर्पण पर
शायद देख नहीं पायेगा
रीतापन जीवन का

रामनारायण सोनी
५.९.२१

कितनी मजबूर है
उड़ने को चिड़िया
तैरते रहने को मछली
बहने को यह समीर
उठने को धुआँ
मैं भी
तुम्हें निरन्तर याद करने को

रामनारायण सोनी
५.९

दमकता मुखड़ा 
उस सुर्ख गुलाब का
सौंदर्य और सुवास से सिक्त
अभिभूत और स्तब्ध हो
धरती के आँगन में
देखता ही रह गया मैं
और यह क्या कमाल हो गया?
यकायक महक उठा है 
सारा का सारा 
मेरे भीतर का उपवन
हे शुभे!
एक से ही तो हो तुम दोनों

रामनारायण सोनी

दो लघु कविताएँ

पूछना है तो पूछो
इतिहास मेरा, तुम्हारा, उनका
इन कतरनों और पुर्जियों से
आइने तो बस
रनिंग कॉमेन्ट्री सुनाएँगे

रामनारायण सोनी
२३.०८.२१

तुमने कहा था
रहेगा तुम्हारा साया
साथ सदा ही मेरे
पर यहाँ तो और कुछ भी नहीं है
मेरी परछाइयों के सिवा

रामनारायण सोनी
२३.०८.२१


मुक्तक

शब्द नही अहसास लिखो
कहीं दूर नही आसपास लिखो
आईने मे कोई बसा नही 
बस बिम्बों का अहसास लिखो

क्या बताऊँ सुचिते

क्या बताऊँ सुचिते!
ठगे, ठिठके इन नयनों के
ये रास्ते सभी
बहुत खारे और नम हैं
जिनसे तुम
उतरे हो हृदय में,
ये शब्द भी तो
कितने शबनमी हो गए हैं
हिफाजत करता हूँ इनकी
धूप और हवा से
महसूस होती है इनमें
खुशबू तुम्हारी ही

रामनारायण सोनी
११.०८.२१


हाँ यही तो है वह

वो क्या चीज़ है कि

चोट मुझे लगे और दर्द तुम्हें हो
गर मैं खुश नहीं रहता हूँ
तो तुम भी उदास हो जाते हो
गर मैं सोता हूँ
तो सिरहाने बैठे जागते रहते हो
जैसे ही मैं कुछ बोलने जाता हूँ
वह कहने के पहले ही
तुम्हारे मुँह से निकलने लगता है
जैसे ही हम चुप होते हैं 
चुप्पियाँ जोर जोर से बतियाने लगती हैं
जो जुबाँ नही कह सकी
वह दिल बोलता है, आँखे बोलती है
वे बातें बस तुम्हारी हमारी
मुझमें तुम महसूस होने लगते हो
पूरी सिद्धत से
और शायद तुम में भी मैं उसी तरह
क्यों? क्या रूहें घर भी बदलती हैं?
तुम मुझे यहाँ ढूँढते हो
और मैं तुम्हें वहाँ
जब लौटता हूँ तो तुम्हें
हाँ तुम्हें, मुझी में तुम्हें पाता हूँ
क्या यह अलौकिक प्रेम नहीं है?
एक दम निश्छल, अविरल, अविचल
शायद प्रेम यही है, हाँ बिल्कुल यही है
प्रेम वह परमात्म अनुभूति है

रामनारायण सोनी
२९.७.२१

Thursday, 19 August 2021

micro poetry

मैं समझा था
बहुत दूर आ गया हूँ उससे
मगर खाली नहीं है
उससे कोई भी जगह

रामनारायण सोनी
  २. ८.२१


चौंधियाई
मेरी आखें उम्र के साथ साथ
पर आँखें आत्मा की
देखने लगी और भी साफ साफ
फुल्ली मेच्योर्ड

शायद मैं गलत हूँ
और तुम सही
जो भी पढ़ा लिखा तुमने
शीर्ष पर प्रतिष्ठित होने को
पर, मैंने तो बस जीने भर को
संवेदनाएँ बहुत सी
फिर खड़ी हो गई है मुझ में
मेरी गलतियाँ अच्छी लगती है मुझे

There is a distance between possibly and reality we have just to travel through this distance. We have to have courage, commitment and walk through this distance.


Wednesday, 18 August 2021

शतदल

क्या कहते हो!
गरीबी कीचड़ है?
पुखराज, नीलम, और
हीरे निकले हैं इन्ही दलदलों से

तुम से तुम को मिलवाऊँ

तुम से तुम को मिलवाऊँ

आओ तुम्हें मैं हँसना सिखाऊँ
जीवन का वह छोर दिखाऊँ
बैठे हम में सहज सलोने
ईश्वर का दर्शन करवाऊँ।।
तुम भी तो मुझ जैसे ही थे
चंचल चपल हठीले नटखट
हाथ थाम कर आओ संग संग
तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

जाने कौन गली में खोये
गुपचुप क्यों रोया करते हो
जीवन की भारी गठरी को
बेमन से ढोया करते हो ।
कूद पड़ो तुम उस अतीत में
जिसमे मस्ती यूँ झरती थी
किलकारी भरती सखियों की
वो टाँगा टोली तुम्हें दिखाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

कैंची से सीखी थी सायकल
कीचड़ में गेड़ी चलती थी
बीले की खाली खोलों की
कोयल रस्सी से बजती थी।।
लकड़ी के घोड़े पर बैठे
कैसे तुम दौड़े फिरते थे
उस कुलाम डाले की डाली
पर फिर तुमको लटकाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

ढूँढो फिर से उन यारों को
फिर से बचपन खड़ा हो सके
जिनको देख तुम्हारी आँखे
नेह नीर से सजल हो सके
उन भूले बिसरे रिश्तों की
स्वर्णिम सी उन शाम सुबह की
मद मस्ती की उस बस्ती की
मस्त गली में तुम्हे घुमाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

ताल तलैया नदी छापरी
याद तुम्हें भी आती होगी
चुरा लिया करते थे अमिया
उस बगिया को तुम्हें दिखाऊँ।।
टिम टिम कर जलते दीये की
मद्धिम मद्धिम छनी रोशनी
जमी काजली आले की से
चलो डिठौना तुम्हें लगाऊँ।।
  तुम को तुम से ही मिलवाऊँ।।

रामनारायण सोनी
१७.०८.२१

शतदल

क्या कहते हो!
गरीबी कीचड़ है?
पुखराज, नीलम, और
हीरे निकले हैं इन्ही दलदलों 

सुचिते

क्या बताऊँ सुचिते!
ठगे, ठिठके इन नयनों के
ये रास्ते सभी
बहुत खारे और नम हैं
जिनसे तुम
उतरे हो हृदय में,
ये शब्द भी तो
कितने शबनमी हो गए हैं
हिफाजत करता हूँ इनकी
धूप और हवा से
महसूस होती है इनमें
खुशबू तुम्हारी ही

रामनारायण सोनी
११.०८.२१


हम, तुम और वे

जैसी ही मैं बाहर निकला

किताबों, धर्मों, जातियों,
देशों-प्रदेशों, लिंगों और रंगों से
तो बिल्कुल एक से हो गए हैं
मैं, तुम, और हम सब
हमारे एक से गुण है-
जन्म और मृत्य,
हँसना और रोना,
जागना और सोना,
प्रेम और घृणा
कटने पर लाल ही खून का बहना
और हाँ
हाथ, पैर, आँख, नाक, कान
गिनतियों में सब बराबर
मैं, तुम, वह! सभी सन्तति हैं
उस असीम की, विराट की
टूक-टूक हो गए हम
हम से मैं और फिर केवल मैं
इन सीमाओं से घिरते ही
मैं अमृत का पुत्र हूँ, तुम भी, वे भी
जिसकी रचना है यह समस्त
भुवनभर हथेलियाँ हैं उसकी
रम रहा है हो कर स्पन्दन
मुझ में, तुम में, सब में

रामनारायण सोनी
०८.०८.२१

सुन ए जिंन्दगी

सुन ए जिन्दगी!
तुम्हारे पास तो मील के कई पत्थर हैं
कुछ सुडौल सुन्दर से हैं उनमें
याद करना मुझे तुम
अपनी ठोड़ी पर उँगली टिकाए
उन सुन्दर पत्थरों पर बैठ कर
फुसफुसाना अपनी जुबान मैं
और सुन कर मैं...
मैं यहाँ बैठ कर मुस्कुराऊँगा
तुम भी मुस्कुराना मेरे संग संग

रामनारायण सोनी
२६.०७.२१

सुन ए जिन्दगी!
शूलों, भूलों और
परेशानियों के पलों में
इन्हे वो कहीं देख न ले
मेरे माथे पर पड़ी सिलवटों को
छिपा कर कही रख देना
बदले में मुट्ठी भर
मुस्कान बिखेर देना!
बस!

   रामनारायण सोनी

मुक्तक

प्रार्थना में बन्धन कहाँ? 
प्रेम में अनुबन्ध कैसा? 
अर्चना में प्रतिबन्ध कैसा? 
आराधना आत्मा की पुकार है 
आस्था जीवन का आधार है
सुमिरन प्रभु नाम की गुंजार है

नव प्रभात यह विहगों का, रव ले कर आया है
नव पल्लव, नव कुसुम, नवल दल, सर नीरज मुस्काया है
रजनी ने नीली चूनर में, तारक थाल सजाया है
नेहसिक्त इस पुण्य धरा ने कण कण यूँ महकाया है

सुनो सुनयने!

सुनो सुनयने!
ये रात और दिन!
रात, जो नींद कम
जाग अधिक ले कर आती है
दिन, जो थकन
और पेशानियों पर
पसीने छोड़ जाता है
लेकिन बीच में!
इसी बीच में थोड़े पलों के लिये
संध्या गौओं की
पावन धूलियाँ ले कर आती है!
मल जाती है गुलाल
तुम्हारे रक्तिम कपोलों पर
निम्बोलियों की कड़वी मीठी
महमहाती गन्ध के बीच
हरियाई डाल पर रक्त कण्ठी सुग्गे
चिटिर-पिटिर करते चिंचियाते हैं
तुम्हारी ही तरह
चुलबुले चंचरीक की गुन-गुन सुर
कानों में मथु घोल जाते हैं
अचानक मेरे स्वप्न पाँखी
प्रीति के गहन आकाश में
डैने फैलाये तुम्हारे
अलकों पर उतर आते है
कुछ भार सा महसूस करता हूँ
अपने काँधे पर
कि तुम हो कर जैसे त्रिभंगी
अपना शीश टिकाए हो
मधुभार से

रामनारायण सोनी
४.७.२१

कौन हो तुम?

कौन हो तुम?
कौन हूँ मैं?
शायद "मैं" और "तुम"
"हम" ही हैं
यह विलय कैवल्य है
यह विलयन प्रेम है
यह प्रेम तब अलौकिक है
यह रसायन अद्भुत है
*"रसो वै सः"*
यह देहात्म भाव शून्यता
हमारे प्रेम का परिमार्जन है
प्रेम दीवानगी है वह
जो पैरों में फुँघरू बाँध देता है
प्रेम धारा है वह
जो हृदय के गर्भ से बहना शुरू करती है।
प्रेम वह आह्लाद है
जो मरुमय जीवन में आनन्द भर देता है
बाहें जहाँ करुणा से फैल जाती हैं
प्रेम में प्रधान तू है और अन्तिम भी तू है 
तो फिर "मैं" हूँ ही कहाँ।
बस तू ही तू है।

रामनारायण सोनी

शब्दों के उस पार
 भावों के सागर में
   बस संधिकाल वही है
  मैं और तुम...

About Me

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन