*

*
*

Wednesday, 10 October 2018

कणिकाएँ

किसी के लिये होऊँ या न होऊँ
मेरे लिए मैं होऊँ या कि न होऊँ
तुम्हारे होने का जिक्र होता रहे
इसके लिए मेरा होना जरूरी है

👁👁👁👁👁

प्रीत के सागर में
डूबता हूँ मैं अगर
किनारे पर
खड़े रहना तब तक
जब तक
साँसों के बुलबुले
सारे न निकल जाएँ

👁👁👁👁👁👁

आप मेरे अपने हैं।
मुझ पर अपनों का प्यार बहुत है
यह प्यार ऐसा ही रहने दो
यह बड़ा खूबसूरत कर्ज है
मुझे ऐसा ही कर्जदार रहने

No comments:

Post a Comment

Blog Archive

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन