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Wednesday, 10 October 2018

मौन का स्वर

अँगुलियों  के पोर-पोर
चूम लिये सहसा
मैंने फिर फिर
जीवित इनमें हैं मधुमय

वे प्रथम संस्पर्श
गहन दिग दिगन्त से
प्रेम रसधार गिरी
स्वप्निल इस झील में
व्यक्त हुए हो तुम
जल लहरियों पर

संतृप्त हुए मौन स्वर में
अम्बर की खिड़की से
स्मित अधरों की
छलका मकरंद
भीग गए शहदीले
अँगुलियों के पोर-पोर

चूम लिए सहसा
मैने फिर फिर
जीवित इनमें हैं मधुमय
वे अप्रतिम संस्पर्श

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन