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Wednesday, 10 October 2018

महुए के फूल

टहनी पर ग़ुलाब की
हो जाओ कली तुम
पलके उघाड़ते ही
फिजाएँ महक उठेगी

बूँद बूँद बन कर तुम
बिखरो आकाश में
झाँकेगी छैल छ्टा
इन्द्रधनुषी तुम में से

सजाओं माथे पर
निष्कम्प अग्नि शिखा
अपने पिघले मोम को
बदल दो उजास में
वंशी के अन्तस में

उतरो प्राणों सी फूँक बन
बिखरोगी रन्ध्रों से
रागिनी रसवन्ती बन

बीज बनो,
अंकुर के उगने को
अंतस के प्रस्तर से
देख रहा बाट कब से
कब महुआ बन फूलूँ मैं



[इसमें विशुद्ध अध्यात्म है
मेरी आत्मा यहाँ मेरी "मैं" के प्रति आह्वान कर रही है]

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन