शब्द रीते हो गए हैं
भाव भींगे जम गए हैं
भाव भींगे जम गए हैं
दिव्य पथ का वह पथिक
व्योम सा विस्तीर्ण मानस
व्योम सा विस्तीर्ण मानस
श्वास भी ये कण्ठ में आ
आज कुण्ठित हो गए हैं
आज कुण्ठित हो गए हैं
पत्थरों के भी बुतों के पास से
जरा गुजर कर देखना तुम
जरा गुजर कर देखना तुम
ढुलकते अश्रु भी दिख जाएँगे
नमन करते शीश को मत रोकना तुम
नमन करते शीश को मत रोकना तुम
["काल के कपाल पर"
वनाञ्चल की पत्रिका में प्रकाशित]
वनाञ्चल की पत्रिका में प्रकाशित]

No comments:
Post a Comment