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Wednesday, 10 October 2018

तुम मेरे-मैं तुम्हारा

हे पावन परमेश्वर मेरे!
मैं चलता हूँ
दिग्दिगन्त  में
तुम तक आने के लिए
चाहे तुम मिलो, चाहे न मिलो
सर्वत्र ही पाता हूँ स्पन्दन तुम्हारा
महसूस करता हूं दिन-रात तुम्हें
इसलिए, हाँ इसीलिए.........
मैं तुम्हारे पास होऊं या नही
जानता हूँ मैं सिर्फ सफर
तुम पास हो सदा ही
सदैव तुम मेरे हो
और मैं तुम्हारा

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन