टोकनियों में भर भर
उम्र भर ढोये कनस्तर
जिन्दगी हुई ऐसी बसर
उम्र भर ढोये कनस्तर
जिन्दगी हुई ऐसी बसर
इस शहर से उस शहर
चलता रहा शामो सेहर
यायावरी अभी अभी ठहरी
पीठ पर लदे अहसास
गाँठ में बंधे थोड़े रोमाञ्च
धागों से बंधे मजबूत रिश्ते
कर्म के तानों बानों पर
बुनी चादर, बैठी जीत हार
मेरी जिन्दगी की यह बही

No comments:
Post a Comment