लिखना शेष अभी है मुझको
लोचन में प्लावित अश्कों को।
करुणा के कातर क्रन्दन और
विगलित तन बुझती पलकों को।।
लोचन में प्लावित अश्कों को।
करुणा के कातर क्रन्दन और
विगलित तन बुझती पलकों को।।
बहुत लिखा है सोनजुही से
भीनी महकी हुई बगिया को।
कीचड़ भरी तंग बस्ती पर
लिखना शेष अभी है मुझको।।
भीनी महकी हुई बगिया को।
कीचड़ भरी तंग बस्ती पर
लिखना शेष अभी है मुझको।।

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