भाव निर्झर, रूह की राहत, प्रेम और समर्पण
बरखा की बूंदों के जैसा बनता मिटता मेरा मन
बरखा की बूँदो के जैसा झर झर झरता मेरा मन जीता सारे ही जग को पर हारा तुम से मेरा मन
जीता सारी दुनिया को पर हारा तुमसे मेरा मन
No comments:
Post a Comment