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Friday, 12 October 2018

आँगन का पीपल

आँगन का पीपल
भोर अरुणाई में
कानों में कह गया कुछ
क्यों मायूस हो तुम

देखते हो!
मैं बूढ़ा नहीं, पुराना हूँ
करता हूँ हर बरस
श्रृंगार नूतन
पुराने जीर्ण पत्तों को झाड़ कर
जोड़ता हूँ उमंग, उत्साह खुद में
जीता हूँ ले कर जिजीविषा

चलो! हम साथ जिएँ
जी भर कर
थोड़ा अपने लिए
बाकी सब के लिए

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन