रोशनी के द्वार से क्यों लौटते हो, हे पथिक!
दीप बन जलते रहे निर्वात में तो क्या जले
स्वेद का स्नान कर लो, शूल राहों के कुचल
मुफ्त मे शिखर के सुख भी मिले तो क्या मिले।
स्वेद का स्नान कर लो, शूल राहों के कुचल
मुफ्त मे शिखर के सुख भी मिले तो क्या मिले।
[डॉ मोहन गुप्त ने सुझाया....
मुफ्त में ही शिखर के सुख भी मिले तो क्या मिले/चौथी पंक्ति ह ठीक रहेगी।छन्दोभंग भी न होगा।शुभ कामनाऐं।]
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बादल तो बरसे नहीं
यादें बरस गई
तन दहकता ही रहा
साँसें दरक गई
यादें बरस गई
तन दहकता ही रहा
साँसें दरक गई
जिन्दजी के वे सफ़े
फर्श पर बिखरे युँही
वक्त फिसला रेत सा
किस्मत सरक गई
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बादल तो बरसे नहीं यादें बरस गई
तन दहकता ही रहा साँसें दरक गई
जिन्दजी के वे सफ़े फर्श पर बिखरे युँही
वक्त फिसला रेत सा किस्मत सरक गई
जिन्दजी के वे सफ़े फर्श पर बिखरे युँही
वक्त फिसला रेत सा किस्मत सरक गई

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