*

*
*

Wednesday, 10 October 2018

विविधा

रोशनी के द्वार से क्यों लौटते हो, हे पथिक!
दीप बन जलते रहे निर्वात में तो क्या जले
स्वेद का स्नान कर लो, शूल राहों के कुचल
मुफ्त मे शिखर के सुख भी मिले तो क्या मिले।


[डॉ मोहन गुप्त ने सुझाया....
मुफ्त में ही शिखर के सुख भी मिले तो क्या मिले/चौथी पंक्ति ह ठीक रहेगी।छन्दोभंग भी न होगा।शुभ कामनाऐं।]

*************

बादल तो बरसे नहीं
यादें बरस गई
तन दहकता ही रहा
साँसें दरक गई

जिन्दजी के वे सफ़े
फर्श पर बिखरे युँही
वक्त फिसला रेत सा
किस्मत सरक गई

**************

बादल तो बरसे नहीं यादें बरस गई
तन दहकता ही रहा साँसें दरक गई
जिन्दजी के वे सफ़े फर्श पर बिखरे युँही
वक्त फिसला रेत सा किस्मत सरक गई

No comments:

Post a Comment

Blog Archive

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन