भाव निर्झर, रूह की राहत, प्रेम और समर्पण
जानता हूँ मेरी चोंच में भरे पानी से आग तो बुझेगी नही पर मैं रुकूँगा नही
मानता हूँ उछाला पत्थर मैने नही भेद सकेगा कभी इस गर्वीले आसमान को पर मैं रुकूँगा नही
समझता हूँ जलता हुआ अदना दिया हूँ आँधियाँ हर दिशा से चल रही पर मैं बुझूँगा नही
No comments:
Post a Comment