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Sunday, 3 January 2021

क्योंकि

क्योंकि

क्योकि......
तुम पथिक हो,
पाथेय है, प्रसाद भी है
तुम्हारे पास...
उस परमात्मा का!
काल की कील पर घूमते
जीवन चक्र में
प्रेम के निर्मल, स्वच्छन्द
..आकाश में
डैने फैलाओ !
पाँखी हो प्रेम के तुम
क्योंकि...
तुम रुके तो चूके
क्योंकि...
ऐ मेरे हंसा!!!
यादों के मोती भरे पड़े हैं..
मन के इस मानसरोवर में

रामनारायण सोनी
४.१.२१

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन