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Saturday, 2 January 2021

तुम भी अवगाहन कर लो

मैं कौन हूँ, 

मेरा नाम तो परिचय है ही मेरा
पर कुछ और भी पहचाने हैं मेरी
मैं चाक चढ़ी मिट्टी हूँ
मैं घाटी में लुढ़का पत्थर हूँ
आँगन का मैं उपवन हूँ
मैं सफेद सी वह चादर हूँ
मैं तुलसी का वह बिरवा हूँ

पर मैं वह अवधू शिल्प हूँ..
मैं गर मिट्टी हूँ तो
...वह दादी थी मेरी कुम्हार,
मैं गर पत्थर हूँ तो
...माँ मेरी मेरी शिल्पकार,
मैं उपवन हूँ मुझे तो
...पिता ने माली बन पाला है
मैं वह दीन हीन था
...इस समाज ने गोदी में बैठाला है
मेरे अंतस में
..दिन-रात खड़ा है वह सद्गुरू
मैं गर आँगन में तुलसी बिरवा हूँ
...मीठे रिश्तों की धूप में नहाया हूँ
मैं एक बहती नदी में हूँ
...""प्रेम" है वह अजस्र धार
  जिसमें आह्लादित हूँ

आओ! तुम भी अवगाहन कर लो!!

रामनारायण सोनी

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन