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Saturday, 16 January 2021

तन की तह के पार


तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है
मन की मन्थर धार शुभे! यह कितनी सुन्दर है।
मन का वैभव मन से दीखे कैसा सुन्दर दरपन है
मुझ से तुम तक गुपचुप जाना सुन्दर आवर्तन है।।
तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है

रागों की रसवन्ती ताने मन की वीणा बजा रही
रजनी के माथे चंदा की सुन्दर बेंदी लगा रही।
मन द्वारे साँझ सकारे चितवन चंचल झाँक रही
पलकन की चादर के पीछे मन की शोखी ढाँक रही ।।
तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है

मोद भरी अलियों की गुंजन मन का सौरभ पीती
मन के मधुकर की वे रातें अवगुण्ठन में ऐसे बीती।
खामोशी की बीन बजा कर सोन चिरैया रीती
मन कहता मन ही सुनता है मन की न्यारी नीती।।
तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है

मन का ही फानूस टँगा है तन के मौन भवन में
चारों ओर उजाले इसके हुई रोशनी नन्दन वन में।
मन के बादल मन की धरती मन के नील गगन में
टिप टिप करती बरखा मन की भीगा मन ही मन में।।
तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है

दूर खड़ा तन देख रहा है छबियाँ कितनी दौड़ रही
मन ने मन को अन्दर अन्दर प्रेम कहानी कई कही।
मन के कुन्दन की स्वर्णाभा तप कर कितनी और बही
मन की सरिता मन का पानी मन की शीतल धार बही।।

तन की तह के पार तुम्हारा मन कितना सुन्दर है

रामनारायण सोनी
१५.१२.२०२०

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