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Tuesday, 5 January 2021

मन धरा पर

नील नभ का नयन तारा वह छलकता नीर उसमें
प्रेम की आकाशगंगा मन धरा पर आज उतरी।
खिल उठा उपवन उपासी सर्वदिश मधुगन्ध बिखरी
प्रेम की कमनीय गंगा मन धरा पर आज उतरी।।

द्वार देहरी दीप हुलसे आँगने भर चौक पुरती
प्रेम की चूनर छबील मनधरा पर आज निखरी।
आँज महकी साँझ बेला गेारजों से माँग भरती
प्रेम की ललना लजीली मन धरा पर आज सँवरी।।

स्वप्न जागे प्यास जागी छन्द में अहसास जागे
प्रेम की पागी नगरिया मन धरा पर आज जागी।
जो वियोगी कामिनी के संग सारी रात जागी
प्रेम की सोई सुनयना मन धरा पर आज जागी।।

प्रात की पनिहारियों ने पनघटों पे पग धरे हैं
प्रेम की जल धार ले कर मन धरा के घट भरे हैं।
गा रही परभातियाँ ये किंकीनी कर की खनक से
प्रेम की बेला रुहानी मन धरा पर सुर झरे हैं।।


रामनारायण सोनी
६.१.२१

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन