गीत गगन के गाऊँ मै, तुम गाओ मेघ मल्हार
प्रीत का पावन पावस ले हम नेह धरा पर उतरें।
मेघ बचे न बचे गगन न बोल बचे न बचे अगन
बूँद बनें हम एकल होवें नेह धरा पर ऐसे उतरें।।
हम तुम नेह धरा पर ऐसे उतरें।।
मन में मन को ऐसे घोलें जैसे जल में मिसरी
भावों के मीठे पानी से भरी रहे मानस की गगरी।
अरुणिम आभा लेकर ऊषा अपने आँगन उतरी
तेरी मेरी व्यथा-कथा अब तन से मन से बिसरी।।
हम तुम नेह धरा पर ऐसे उतरें।।
पवन बसन्ती बनो लहरिया फूले इस उपवन में
मैं पराग शतदल का हो कर संग उडूँ कानन में।
जगती को मिल कर महकाएँ उतरें जन गण मन में
अलग अलग रह हो न सकेगा पड़े नहीं भटकन में।।
हम तुम नेह धरा पर ऐसे उतरें।।
रामनारायण सोनी
१६.१२.२०२०

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