जब कविता
थी अपने शैशवकाल में,
नन्हे नन्हे डग चलीं थी
भावनाएँ अँकुआ रही थी
हल्के जर्द पड़े डायरी के पन्नों में
सूखी वे गुलाब की पंखुडियों
मुस्कुराई, महमहाई...!
काल की कील पर टँगी
सुइयाँ पीछे दौड़ी,
ठिठकी, कहीं ठहर गई
वहाँ, जहाँ लिखीं थी
ढाई आखर की
छोटी सी विराट कहानी...!
रामनारायण सोनी
२२. १२. २०२०

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