जो कदम तुम चल लिये पदचिह्न बनते जायँगे।
मील के पत्थर सफर के याद बस रह जायँगे।।
युग प्रवर्तन तुम करोगे मुट्ठियों में आग भर लो।
कर्म के लेकर हथौड़े साधना की माँग भर लो।।
इन्द्र का पवि भी दधिचि की अस्थियों ही से बना।
प्रात का रवि भी तमस की गोद से आ कर तना।।
बिन गरल के सर्प भी बस उम्र भर ही रेंगता है।
कोई बिरला छेदने नभ तान पत्थर फेंकता है।।
सिंह की हुंकार गूँजे बीहड़ों बन कुंजरों में।
शक्ति का परिचय भरा चिंघाड़ते करि के सुरों में।।
शंख की ध्वनियाँ महज प्रार्थना का सुर नहीं है।
न जगे पुरुषार्थ-रण जहँ भेरियों के सुर नहीं है।।
हिम शिखर की श्रृंखलाएँ वीर गाथा कह रही है।
सागरों की चीर छाती शक्तियाँ नित जग रही है।।
व्योम में परचम गड़े है गर्जना के पवन सुत के।
वाहिनी बन राष्ट्र रक्षक अहर्निश यहँ जग रही है।।
राष्ट्र के प्रहरी यहाँ जब हाथ में संगीन ले कर।
बन कहर बरपे समर में बाहुओं में वज़्र धर कर।।
काँपते अरिदल छुपे हो बंकरों की आड़ ले कर।
बाँकुरे रण के उन्हें भी ध्वस्त करते ताड़ ले कर।।
रामनारायण सोनी
१४.०१.२१

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