*

*
*

Tuesday, 16 March 2021

कैसे कहूँ



मैंने बादल की ओर देखा
शायद बरसात हो जाए,
फूल को छुआ कि मुझे
शायद तुम्हारी छुअन का
कोमल अहसास हो जाए

कलम उठाई कि तुम्हें लिख डालूँ
पर तुम शब्द तो हो नहीं हो
जुबां भी जिसे न बोल पाए
कि कहीं काँपते अधरों पर ठहरी
नयनों की खारी बूँद न ढुल जाए

मैंने हवाओं की खुशामदें की
कि वे शायद कोई खबर लाए
पर वे लौट गईं उल्टे पाँव ही
तुम्हारे पैरों के वे निशान भी
रास्तों पर से नोच गया है कोई

रामनारायण सोनी

No comments:

Post a Comment

Blog Archive

About Me

My photo
खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन