मैं नवाऊँ शीश अपना जिस धरा में स्वेद तेरा
पुष्प का परिमल बना है श्रम विरंजित रक्त तेरा
पूष की जाड़ों भरी हो वह सिहरती रात भीषण
जेठ के हों दिन तपिश के कर रहे हों आग वर्षण
तू गला है और तपा है कर्ज माटी का चुकाने
सब लगे हैं उन श्रमों को स्वार्थ में अपने भुनाने
हाय! ये हतभाग तेरे।
खेत के विज्ञान हमने विश्वभर में खोज डाले
फिर सभी चुन चुन हमारी भूमि में विष घोल डाले
नीड़ और वे पेड़ मेढ़ों के सभी तो काट डाले
कूप वापी नद नदी जल स्रोत सारे सोंख डाले
अब न होंगी मधुपरी वें जो परागण में लगी थी
और कीटों को निगलती पाँखियाँ भी तो लगी थी
हाय! कितने वे बिचारे।
पूर्ण वसुधा के निवासी थे कुटुम्बी लोग अपने
विश्व अब बाजार बनकर लूटता घर-बार, सपने
गो धनों की थी धुरी पर यह कृषी सम्पन्न सारी
अब मशीनें आग उगलें सभ्यता रौंदी हमारी
छोड़ कर अपनी विरासत दौड़ अंधी दौड़ लेंगे
अन्त में अपना करम ही पत्थरों से फोड़ लेंगे
हाय! ये हतभाग मेरे।
आओ लौटें फिर सुनहरी वो चिरैया ढूँढ लाएँ
भारती के भाल से यह विषबुझी कालिख मिटाएँ
गाय, गौरी, पनघटों की बस्तियाँ फिर ढूँढ लाएँ
शाप देती भूमि के विष अमृता ही से बुझाएँ
फेंक कर घातक रसायन उर्वरा फिर खोज लाएँ
डूबती वैदिक कृषि को फिर नया जीवन दिलाएँ।
अब न हो हतभाग मेरे।
रामनारायण सोनी
१०.०३.२१

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