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Monday, 8 March 2021

सपने हो न सके अपने

हम तुम दोनो मौन रहे, जग व्यस्त रहा अपने अपने
वह विभावरी बीत गई, अंचल में हाय! लिये सपने
वे उठे गिरे फिर गिरे उठे, भावों के भ्रमर पिपासु थे
अपनी तरणी फिर फिर टूटी, वे विधि के झंझावात तने
अधरों के द्वार न खोल सके वे शब्द बिचारे थे बौने
ऊषा की गागर भरी नहीं, वे लौटे गये रीते सपने।
            सपने हो न सके अपने।।
कहीं ढुलक न जाय कभी, नीरज नयनो से अश्रु प्रिये!
अपनी हस्त लकीरों ने हा! कितने ही आभिशाप जिये
पर महीन से धागों से ही बँधे रहे हैं सजल हिये
कितनी अकथ कहानी छूटी क्रन्दन का अभिसार लिये
अपनी दीपशिखा की लौ में अपने ही मन होम किये
तृषा प्राण की बुझी नहीं, सब बिखर गये रीते सपने।
              सपने हो न सके अपने।।
उस उपवन को सजा मिली जिसने बसन्त को पाला था
खाली माटी कलशों में मधु आसव विधु का डाला था
चन्दन रोली के रंग लिये जिसने आँगन रंग डाला था
थोथे जीवन में ढंग लिये हर पल गरल निवाला था
नख से शिख तक ओढ़ा हमने गम का वही दुशाला था
मृषा आस की बेल मरी, और सूख गये अपने सपने।
            सपने हो न सके अपने।।
रामनारायण सोनी
०८.०३.२१

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