भाव निर्झर, रूह की राहत, प्रेम और समर्पण
एक ही तो है
नहीं मिलते हो तो खोजता फिरता हूँ तुम्हें पाने को यहाँ-वहाँ, कहाँ-कहाँ
मिलते हो जब भी तुम भूल जाता हूँ मैं सब कुछ और मुझे भी शायद एक ही हैं मैं और तुम
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