ज्योत्सना भरती कैसा ताप,
रजतमय रश्मि लगे अभिशाप।
प्रीत के पाहुन बसे विदेश,
राह पर टिकी दृष्टि अनिमेष।
लुटा है मन का सब अधिकोष,
दिलाये कौन मुझे परितोष।
जगी है प्राणों में यह प्यास,
जगा फिर बूँद बूँद अहसास।।१।।
जगा जब बूँद बूँद अहसास,
निखिल अवनी में गूँजे हास।
जगे नीरव में अस्फुट छन्द,
महकती मलयज में मकरन्द।
कहीं विकसे सर में शतदल,
प्रणयिनी तरुणी है आकुल।
तड़ित है अधरों पर मृदु हास,
जगा जब बूँद बूँद अहसास।।२।।
अजब सा गूँजा है कलरव,
मधुर से स्वप्न जगे अभिनव।
कुलाचें भरता मन मद-भार,
बदन में रोम पुलक का भार।
विकम्पित अधरों में निःश्वास,
नयन में नीर किये अधिवास।
रमा है कण कण में मधुमास,
जगा जब बूँद बूँद अहसास।।३।।
रामनारायण सोनी
१०.०३.२१

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