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Thursday, 4 March 2021

द्वार की वह कुण्डी

द्वार की वह कुण्डी
व्यर्थ ही है 
जिसे तुमने खटखटाया नहीं
वे वातायन केवल
दीवार के छेद भर हैं
न प्रवेश करती हों जिनमें से
वे हवाएँ लौटी हों...
तुम्हें छू कर 
अब डोलती रहती हैं
इन दीवारों पर इधर उधर...
..प्रतिच्छायाएँ तुम्हारी
इसलिये इसे मैं घर नहीं मानता
बेवतन-रूह ही
बन गई हैं अब तो
तुम बिन

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन