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Monday, 15 March 2021

अग्निवेश

आँसू
कितने वजनी हैं ये
निकलते ही हलके हुए जाते हो।
आँसू हमारे अन्तस का स्राव है
हँसते मुखौटे के ठीक पीछे
ठण्डे व्रणों से रिसता सैलाब है
भावों का खद-खद कर उबलता
रेंगता फ़िसलता मन्थर रिसाव है
इसे!!
रिसने दो!, बहने दो!,
उठने-गिरने दो!
शायद इन अस्तरों के तले
शान्ति के महीन अंकुर उग आवें
शायद इन अंकुरों से प्रार्थना, पूजा
प्रतिवेदन से अर्चना की
थाल सज्ज हो जावे
और ...
पाप, ताप, शाप के अग्निवेश से
कूट की तरह बाहर निकल जावे।

रामनारायण सोनी
१५.०३.२१
  

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन