मेरे गाँव की सौंधी मिट्टी पर
मैं जब जब माथा धरता हूँ
दिव्य गंध के दिव्य लोक में
ऐसे ही विचरण करता हूँ
जहँ दादी माँ भिन्सारे में
घट्टी की घुर-घुर ताल मिला
गाती प्रभातियाँ भक्ति मयी
सुन बचपन का फूल खिला
भोर हुए पर प्राची से जब
गुदड़ी बन सूरज आता था
बैठ चटैया पर गोदी में में
दादी माँ के इतराता था
एक सहेली प्यारी चिड़िया
चिरिप चिरिप कह जाती थी
खिड़की पर से चोंच दिखाती
मुझको बहुत चिढ़ाती थी

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