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Tuesday, 9 March 2021

दादी की प्रभातियॉँ

मेरे गाँव की सौंधी मिट्टी पर
मैं जब जब माथा धरता हूँ
दिव्य गंध के दिव्य लोक में
ऐसे ही विचरण करता हूँ

जहँ दादी माँ भिन्सारे में
घट्टी की घुर-घुर ताल मिला
गाती प्रभातियाँ भक्ति मयी
सुन बचपन का फूल खिला

भोर हुए पर प्राची से जब
गुदड़ी बन सूरज आता था
बैठ चटैया पर गोदी में में 
दादी माँ के इतराता था

एक सहेली प्यारी चिड़िया
चिरिप चिरिप कह जाती थी
खिड़की पर से चोंच दिखाती
मुझको  बहुत चिढ़ाती थी

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खुले नयन से खुली दृष्टि से, खुले खुले मन के वातायन खुले हाथ से खुले द्वार जो संभव कर दे नया सृजन